
Bihar And Orissa Public Demand Recovery Act 1914 Pdf In Hindi May 2026
यह अधिनियम वर्ष 1914 में ब्रिटिश शासन के दौरान पारित किया गया था। उस समय बिहाल और उड़ीसा एक ही प्रांत (Bihar and Orissa Province) थे। इसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक देय राशियों (Public Demands) जैसे भू-राजस्व, बकाया किस्त, सरकारी ऋण, आदि को त्वरित और प्रभावी तरीके से वसूल करना था।
आजादी के बाद भी यह एक्ट अपने मूल स्वरूप में बिहार और ओडिशा राज्यों में लागू है। इसे समय-समय पर संशोधित किया गया है।
उत्तर: नहीं, यह केवल सरकारी सार्वजनिक देय (Public Demands) के लिए है।
बीसवीं सदी की शुरुआत में, भारत ब्रिटिश शासन के अंतर्गत था। उस समय बिहार और उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा) बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा थे। 1912 में एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ—बंगाल का विभाजन हुआ और बिहार और उड़ीसा को एक अलग प्रांत (Province) का दर्जा दिया गया। Poorly scanned OCR or automated translations can introduce
जब यह नया प्रांत बना, तो ब्रिटिश प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती थी: राजस्व की वसूली।
उस समय बिहार और उड़ीसा के किसान और जमींदार अक्सर सरकारी बकाया (मालगुजारी, लगान आदि) का भुगतान नहीं कर पाते थे या करने से इनकार कर देते थे। पूर्व में बंगाल प्रेसीडेंसी में 'बंगाल लोक मांग पुनर्प्राप्ति अधिनियम, 1895' (Bengal Public Demands Recovery Act, 1895) लागू था। लेकिन नए प्रांत बिहार और उड़ीसा की भौगोलिक और सामाजिक स्थितियां बंगाल से भिन्न थीं।
यहां सिंचाई का सिस्टम (नहरें) बंगाल से अलग था और राजस्व वसूली के तरीकों में भी अंत 1895' (Bengal Public Demands Recovery Act
| सामान्य दीवानी वाद | यह अधिनियम | |--------------------------|------------------| | वाद न्यायालय में दायर किया जाता है। | प्रशासनिक अधिकारी (कलेक्टर/प्रमाणकारी अधिकारी) कार्यवाही करता है। | | प्रक्रिया लंबी (वर्षों लग सकते हैं)। | त्वरित प्रक्रिया (कुछ महीने)। | | शुल्क और वकील की फीस अधिक। | कम खर्चीला, क्योंकि सरकारी अधिकारी कार्यवाही करता है। | | अपील उच्च न्यायालय तक जा सकती है। | अपील राजस्व अधिकारियों (जिला कलेक्टर, आयुक्त) तक सीमित। | | सभी प्रकार के ऋणों पर लागू। | केवल सरकारी बकाया (Public Demands) पर। |
खंड 4: बकाये की मांग और प्रमाण पत्र जब कोई व्यक्ति सरकार को कोई धनराशि (जैसे भू-राजस्व, कर आदि) चुकाने में चूक करता है, तो संबंधित अधिकारी उसे देय राशि का 'प्रमाण पत्र' (Certificate) जारी करता है। इस प्रमाण पत्र में बकाया राशि और व्याज का विवरण होता है।
खंड 7: प्रमाण पत्र का परिणाम प्रमाण पत्र जारी होने के बाद, यह एक 'डिक्री' (Decree) के समान माना जाता है, जो सिविल न्यायालय द्वारा पारित हो। इसका अर्थ यह है कि इस बकाये को लेकर अब साधारण सिविल कोर्ट में अलग से मुकदमा दायर करने की आवश्यकता नहीं होती, और वसूली की कार्रवाई सीधे इस प्रमाण पत्र के आधार पर शुरू हो जाती है। Poorly scanned OCR or automated translations can introduce
खंड 8 से 11: वसूली के तरीके प्रमाण पत्र अधिकारी को वसूली के लिए व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं, जैसे:
खंड 36: अवरोध या रोक (Obstruction) यदि कोई व्यक्ति वसूली अधिकारी के काम में बाधा डालता है या झूठी बातें कहता है, तो उसे दंडित किया जा सकता है।

