Ziyarat E: Nahiya In Hindi
यह ज़ियारत मुख्य रूप से इमाम महदी (अ.त.फ.श.) से रिवायत की गई है और इसे 'मफातीहुल जिनान' जैसी प्रसिद्ध दुआ और ज़ियारत की पुस्तकों में शामिल किया गया है। इसे अल-इक़बाल (सैय्यद इब्न ताऊस) और बिहारुल अनवर (अल्लामा मजलिसी) जैसी प्राचीन शिया पुस्तकों में भी उल्लेखित किया गया है।
यह ज़ियारत पहली बार प्रसिद्ध शिया विद्वान, सैय्यद इब्ने ताऊस (र.अ.) की किताब "इक़बालुल आमाल" में मौजूद है। इसके बाद, शेख अब्बास अल-कुम्मी (र.अ.) ने इसे अपनी मशहूर किताब "मफातीहुल जिन्नान" (Mafatih ul Jinnan) में शामिल किया, तब से यह दुनियाभर के शियाओं में बहुत प्रचलित हो गई।
विश्वास के अनुसार, यह ज़ियारत इमाम मेहदी (अ.स.) ने उस समय पढ़ी थी जब वे अपने पितरों के साथ मोहब्बत का इज़हार कर रहे थे। हालाँकि यह ज़ियारत दूर से है (नाहिया का अर्थ होता है - किसी तरफ या दिशा), लेकिन इसमें आध्यात्मिक तौर पर इमाम हुसैन (अ.स.) की मज़ार पर हाज़िर होने का एहसास होता है। ziyarat e nahiya in hindi
| उद्देश्य | विवरण | | :--- | :--- | | अज़ादारी का सबसे ऊंचा मुकाम | यह ज़ियारत सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि रोने और समझने के लिए है। | | इमाम (अ.स.) से जुड़ाव | इसे पढ़ने वाला व्यक्ति सीधे इमाम हुसैन (अ.स.) से मुखातिब होता है। | | कर्बला का मानचित्र | यह ज़ियारत कर्बला की पूरी दास्तान को कुछ ही पन्नों में समेटे हुए है। | | जियादा का बदला | इसमें यज़ीद और उसके लश्कर पर खुली लानत (फिटकार) है। |
"ज़ियारत-ए-नाहिया" एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है "शोकग्रस्त क्षेत्र की यात्रा" या "शोक और पीड़ा की ज़ियारत।" यह विशेष रूप से इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रेम और उनके अहलेबैत (अ.स.) के दर्द को दर्शाती है। "ऐ मेरे आका
"ऐ मेरे आका! ऐ मेरे मौला! अगर दुनिया में मेरी कोई ताकत होती या मेरा कोई सहारा होता, तो मैं जरूर तुम्हारी मदद के लिए दौड़ा आता।"
(यह लाइन बयान करती है कि इमाम सज्जाद (अ.स.) कितना बेबस थे कि वह बीमारी के कारण जंग में नहीं जा सके।) ziyarat e nahiya in hindi
शब्द "नाहिया" का अर्थ है "वह इलाका" या "वह पक्ष"। हालाँकि, इस ज़ियारत के संदर्भ में, "नाहिया" का इशारा उस व्यक्ति की तरफ है जो रोने की हालत में है (नाहा)। यह ज़ियारत असल में इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके 72 साथियों की शहादत के सबसे दर्दनाक पहलुओं का वर्णन करती है।
मुख्य बात: यह ज़ियारत इमाम ज़ैन-उल-आबिदीन (अ.स.) ने उस वक्त पढ़ी थी जब वह कर्बला के मैदान में मौजूद नहीं थे (बीमारी के कारण), लेकिन उन्होंने इतनी विस्तार से हर शहीद का ज़िक्र किया जैसे वह खुद वहाँ मौजूद हों।